आज बहुत दिन के बाद मन किया की कुछ लिखा जाए . कभी किसी देश के बारे में पढ़े थे कि वहां की जनता इसलिए आगे नहीं बढ़ पाई क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति दुसरे की टांग खींचता था . आज बिहार के सन्दर्भ में सही प्रतीत होता है. किसी बाहरी के प्रधानमंत्री बनने पर अपने सर के बाल मुंडवाने की घोषणा करने की बात समझ में आती है. सवाल अस्मिता का जो बनता है.
क्या यह बात बिहार के सन्दर्भ में नहीं कही जासकती.जब किसी बिहार के व्यक्ति के प्रधानमंत्री बनने की बात आयी तो क्यों सभी बिहारियों ने एक सुर से इसका विरोध किया. दुसरे करें तो बात समझ में आती है. परप्रान्त के लोग कहें तो ठीक है पर कोई बिहारी इसको कहता है तो समझ में नहीं आता है. अब गुजरात को देखिये. जब लगा की एक गुजराती प्रधानमंत्री बनने जा रहा है तो सारी की सारी सीटें उसे ही दे डाली. क्या यह कोई सबक नहीं है.
यह कहा जा सकता है कि यह लेख देश को तोड़ने का काम करेगा जोड़ने का नहीं. पर क्या देश को जोड़ने की जिम्मेदारी सिर्फ हमारी ही है. आप एकता अखंडता के नाम पर इस बेरहमी से दमन करते जायेंगे और हम असहनीय पीड़ा और दर्द को सहते. मैं नहीं जनता कितने लोगों ने बिहारी होने के दर्द को जाना है.मैंने देखा है और देख रहा हूँ. जो बिहारी नहीं हैं उन्हें भी बिहारी कह कर पुकारा जाता है. बिहारी शब्द किसका पर्याय बन चूका है आज मुझे बताने की जरूरत नहीं है. और पिछले दो तिन वर्षों में हुए परिवर्तन को भी देख रहा हूँ. यकीन जानिए परप्रान्त्वसियोंके व्यव्हार में आये इस परिवर्तन के लिए यदि कोई जिम्मेदार है तो सिर्फ नितीश कुमार और कोई नहीं .
इतिहास ने सदैव उसे ही संजो कर रखा है जिसको वर्तमान ने सताया है. नितीश कुमार के दृष्टिकोण, उनकी क्षमता और उनकी कार्यकुशलता का विश्लेषण आने वाली पीढियां ही करेंगी. वर्तामानिक विद्वजन का अहंकार इसे देख नहीं पायेगा.
नितीश कुमार का निर्णय एक सही निर्णय है. कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति इस से बेहतर निर्णय नहीं ले सकता.
क्या यह बात बिहार के सन्दर्भ में नहीं कही जासकती.जब किसी बिहार के व्यक्ति के प्रधानमंत्री बनने की बात आयी तो क्यों सभी बिहारियों ने एक सुर से इसका विरोध किया. दुसरे करें तो बात समझ में आती है. परप्रान्त के लोग कहें तो ठीक है पर कोई बिहारी इसको कहता है तो समझ में नहीं आता है. अब गुजरात को देखिये. जब लगा की एक गुजराती प्रधानमंत्री बनने जा रहा है तो सारी की सारी सीटें उसे ही दे डाली. क्या यह कोई सबक नहीं है.
यह कहा जा सकता है कि यह लेख देश को तोड़ने का काम करेगा जोड़ने का नहीं. पर क्या देश को जोड़ने की जिम्मेदारी सिर्फ हमारी ही है. आप एकता अखंडता के नाम पर इस बेरहमी से दमन करते जायेंगे और हम असहनीय पीड़ा और दर्द को सहते. मैं नहीं जनता कितने लोगों ने बिहारी होने के दर्द को जाना है.मैंने देखा है और देख रहा हूँ. जो बिहारी नहीं हैं उन्हें भी बिहारी कह कर पुकारा जाता है. बिहारी शब्द किसका पर्याय बन चूका है आज मुझे बताने की जरूरत नहीं है. और पिछले दो तिन वर्षों में हुए परिवर्तन को भी देख रहा हूँ. यकीन जानिए परप्रान्त्वसियोंके व्यव्हार में आये इस परिवर्तन के लिए यदि कोई जिम्मेदार है तो सिर्फ नितीश कुमार और कोई नहीं .
इतिहास ने सदैव उसे ही संजो कर रखा है जिसको वर्तमान ने सताया है. नितीश कुमार के दृष्टिकोण, उनकी क्षमता और उनकी कार्यकुशलता का विश्लेषण आने वाली पीढियां ही करेंगी. वर्तामानिक विद्वजन का अहंकार इसे देख नहीं पायेगा.
नितीश कुमार का निर्णय एक सही निर्णय है. कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति इस से बेहतर निर्णय नहीं ले सकता.
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