अब जो होगा वह तो समय के गर्भ में है. पर एक बात समझ में अब आती है कि जर्मनी में हिटलर का अभ्युदय भी कुछ इसी तरह हुआ होगा ."तुम मेरा साथ दो मैं तुम्हें तुम्हारे अपमान का बदला अवश्य दिलाऊंगा. तुम्हें सर उठाकर चलना सिखाऊंगा." और परिणाम तो वही होना था. कौन नहीं चाहता कि वह स्वाभिमान के साथ बल्कि यूँ कहिये कि दुसरे के स्वाभिमान से ज्यादा लेकर जिए? सर उठाकर चलने के आभा के वशीभूत होना तो स्वाभाविक ही है.
एक कहानी सुनाता हूँ........
किसी गाँव के एक कुएं में दो मेंढकों का परिवार रहता था. किसी बात पर उनमें झगड़ा हो गया.एक परिवार दुसरे पर भरी पड़ा.बरसात के आने पर जब कुआं पानी से भर गया तब कमजोर परिवार का मुखिया मेंढक बाहर निकला और एक सांप को अपने कुएं में ये कहकर ले आया कि वह सांप दुसरे मेंढक के परिवार के सदस्यों को खायेगा. अंधे को क्या चाहिए आँखें. सांप पहुँच गया जी. दुसरे मेंढक के सदस्यों को सांप एक एक कर खाने लगा. जब सारे ख़तम हो गए तो सांप ने अब उसी मेंढक के परिवार को खाना शुरू कर दिया जो उसे लेकर कुएं में आया था.
यह कहानी तुष्टिकरण को समझाने के लिए शीतयुद्ध काल में अपने छात्रों को सुनाया करता था. आज के सन्दर्भ में इस कहानी की प्रासंगिकता न रहे ऐसी कामना करता हूँ. पर डरता हूँ . भविष्य की कल्पना अतीत के अवशेषों पर ही तो की जाती है. और यकीन जानिए अतीत बड़ा ही भयानक सन्देश देता है. जब जब सत्ता एक व्यक्ति तक केन्द्रित हुआ है इंसानियत शर्मसार हुई है और हैवानियत ने नंगा नाच किया है. दुनिया की पहली सफल क्रांति के बाद कल्पना भी नहीं किया गया की नेपोलियन का उदय थोड़े ही समय में परन्तु प्रचंड रूप में हो जायेगा या फिर रूस में लेनिन के बाद स्टालिन आएगा.किसे खबर थी भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में भी आपात काल का सामना करना पड़ेगा.
हे भगवान् मेरी सारी आशंकाएं सिर्फ आशंकाएं हीं हों . वे सच न हों.
एक कहानी सुनाता हूँ........
किसी गाँव के एक कुएं में दो मेंढकों का परिवार रहता था. किसी बात पर उनमें झगड़ा हो गया.एक परिवार दुसरे पर भरी पड़ा.बरसात के आने पर जब कुआं पानी से भर गया तब कमजोर परिवार का मुखिया मेंढक बाहर निकला और एक सांप को अपने कुएं में ये कहकर ले आया कि वह सांप दुसरे मेंढक के परिवार के सदस्यों को खायेगा. अंधे को क्या चाहिए आँखें. सांप पहुँच गया जी. दुसरे मेंढक के सदस्यों को सांप एक एक कर खाने लगा. जब सारे ख़तम हो गए तो सांप ने अब उसी मेंढक के परिवार को खाना शुरू कर दिया जो उसे लेकर कुएं में आया था.
यह कहानी तुष्टिकरण को समझाने के लिए शीतयुद्ध काल में अपने छात्रों को सुनाया करता था. आज के सन्दर्भ में इस कहानी की प्रासंगिकता न रहे ऐसी कामना करता हूँ. पर डरता हूँ . भविष्य की कल्पना अतीत के अवशेषों पर ही तो की जाती है. और यकीन जानिए अतीत बड़ा ही भयानक सन्देश देता है. जब जब सत्ता एक व्यक्ति तक केन्द्रित हुआ है इंसानियत शर्मसार हुई है और हैवानियत ने नंगा नाच किया है. दुनिया की पहली सफल क्रांति के बाद कल्पना भी नहीं किया गया की नेपोलियन का उदय थोड़े ही समय में परन्तु प्रचंड रूप में हो जायेगा या फिर रूस में लेनिन के बाद स्टालिन आएगा.किसे खबर थी भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में भी आपात काल का सामना करना पड़ेगा.
हे भगवान् मेरी सारी आशंकाएं सिर्फ आशंकाएं हीं हों . वे सच न हों.
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